Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 25
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हिन्दी अर्थ
जो-जो कर्ता, कर्म, करण आदि से निरपेक्ष होता है वह सब चिद्घनमात्ररूप मैं ही हूँ। सृष्टि
के प्रारम्भ में इस जगत् के भी कर्ता, कर्म, करण आदि का निर्देश नहीं किया जा सकता ऐसा हम पहले
उपपादन कर चुके हैं, इसलिए यह जगत् मेरा स्वप्रकाश आत्मरूप ही है