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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 27,28

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

चिदाकाश ने सृष्टि के आरम्भ में अपने चाकचक्य का (झलक या चमत्कार का) अपने स्वरूप में संकल्प किया वही बिना कारण का जगत्‌ के नाम से काकतालीय के समान स्थित है । यह जगत्‌ अकारण ही स्फुरित होता है स्फुरण को प्राप्त न हुआ भी यह स्फुरित-सा प्रतीत होता हे । चूँकि यह जगत्‌ चित्प्रकाश से देदीप्यमान होकर प्रख्यात हो रहा है इसलिए विद्वान लोग इसे वही परम पद जानते हैं