Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 29
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हिन्दी अर्थ
इसमें जो यह जीव आदि
का स्फुरण होता है, वह भी परमपद ही है क्योकि शून्यता आकाश ही है ओर आवर्त, तरंग, बुदबुद्
आदि जल हैँ