Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
अथवा अवयव-अवयवी भाव की कल्पना के द्वारा जीवादि की ब्रह्मैकता समझनी चाहिये, ऐसा
कहते हैं।
जैसे अवयवी का सावयव एक रूप होता है वैसे ही वास्तव में निरवयव कल्पना द्वारा जीवादिरूप
अवयवयुक्त ब्रह्म एक ही है