Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 36
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हिन्दी अर्थ
यह द्वैत ओर अद्वैत तथा "त्वम्" (तुम) “अहम् (मैं) और “इदम् (यह)
ऐसी कोई भी कल्पना अविद्याविहीन पुरुष को कैसे हो सकती है, उससे शून्य भी कैसे ?