Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 44–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 44,45
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हिन्दी अर्थ
मन का अंकुररूप (मन का संकल्पस्वरूप) राज्यादि जो सुख है, वह
भी कोई सुख है ? तत्त्वज्ञान में पूर्णतया विश्रान्ति होनेपर इन्द्रपद भी तृण की तरह तुच्छ लगता हे । दृश्य
में (विषयभोग में) रमे हुए पुरुष जैसे सोकर या जागते हुए दृश्य को देखते हैं वैसे ही दृश्य में विरक्ति
रखनेवाले शान्त ज्ञानी पुरुष उस परमपद को देखते हैं। अथवा अज्ञाननिद्रा में सोये हुए और विषयभोग
में निरत लोग जैसे दृश्य को अत्यन्त आसक्ति से देखते हैँ वैसे ही दृश्य में अरत (सुप्तप्राय) शान्त सन्त
तत्त्वज्ञानी उस निरतिशयान्द पद को प्रबुद्ध होकर देखते हैं, यह अर्थ करना चाहिये