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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

^सततूयुक्तानाम्‌* यानी निरन्तर विचार मे निमग्न हुए इस प्रयत्नातिशय की उक्ति के तात्पर्य का उद्घाटन करते है । तृणमात्र के भी सर्दी, गर्मी, पशु आदि से रक्षण में उपाय यदि यत्नतः किया जाय तो वह उपकारी होता है उपेक्षा से उपाय किया जाय तो वह कामयाब नहीं होता एक दो त्रिलोकियों का नहीं अपितु कोटि कोटि त्रिलोकियों का ब्रह्मतापादन द्वारा आत्यन्तिक रक्षणरूप तत्त्वज्ञान तो बिना प्रयत्न के कैसे सिद्ध हो सकता है ? ॥४ २॥ जिस निरतिशय आनन्दरूप उत्तम स्थिति का मानुष आनन्द से लेकर ब्रह्मानन्द पर्यन्त उत्तरोत्तर सौ गुने उत्कृष्ट सुखोपभोग के लिए चौदहों भुवनो मेँ अतएव अध्यात्मव्यसन से रहित सम्पूर्ण जीवसंघ तुच्छ भोगों मेँ आसक्त होने के कारण उपहासास्पद है वह उत्तम स्थिति क्योकर प्रयत्न के योग्य न होगी ?