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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 40–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verses 40–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 40,41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अविद्यारूपी भस्म का संमार्जन होनेपर अधिकारी लोगों का चित्त ब्रह्म में रम जाता हे, प्राण उसमें लीन हो जाते हैं यों वे ब्रह्मचित्त ओर ब्रह्मगतप्राण होकर आपस में एक दूसरे को बोधित करते हुए ओर उसके स्वरूप का निरूपण करते हुए प्रसन्न होते हैं, प्रमुदित होते हैं इस प्रकार भजन कर रहे ओर निरन्तर विचार में निमग्न हुए उन अधिकारियों का यह मेरे द्वारा उपदिष्ट बुद्धियोग (ज्ञानयोग) समय पाकर दृढ़ हो जाता है जिससे वे मेरे उस मोक्ष नामक पद को प्राप्त होते हें