Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 39
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हिन्दी अर्थ
तब ज्ञानी लोग भी शास्त्रों में द्वैतअद्वैतविवादों की क्यों इच्छा करते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर
कहते हैं ।
द्वित और अद्वैत में विवाद की इच्छा हृदयाकाश में आरोपित शिष्यप्रबोधरूप फलवाली मंजरी है।
उसके बिना यहाँ प्रबोधाकाश का संमार्जन नहीं होता है ॥ ३ ८॥
अतएव मैंने भी युहृद्भाव से कल्पना द्वारा द्वैतअद्वैतविचारणा की है। जब इसका कार्य सम्पन्न हो
जायेगा तब घर के झाड़ू के समान इसका त्याग कर दिया जायेगा, ऐसा कहते हैं।
मैंने आप लोगों का मित्र बनकर विवाद से द्वैत-अद्वैत का विचार किया है। यह हृदयरूपी घर के
अन्दर अज्ञानरूपी भस्म का मार्जन करनेवाली (बुहारी) है