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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 51

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जो परमपद इस शास्त्र से प्राप्त होता है वही वेद से भी प्राप्त होता है । इस शास्त्र के ज्ञात होनेपर क्रिया यानी पूर्वकाण्ड (कर्मकाण्ड) और ज्ञान यानी उत्तर काण्ड (ज्ञानकाण्ड) दोनों ही पवित्रता को प्राप्त होते हैं यानी अशुद्धि का आत्यन्तिक निरास करते हैं