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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 165, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

मृतिप्रबोधसमये जाग्रत्स्वप्नः प्रशाम्यति । स्वप्नानुभवबोधे च शून्य एवातिभास्वरः ॥ ७ ॥ जीवतः स्वप्नसमये मृतिबोधोदयं विना । परलोकात्मकं जाग्रत्किंचनापि न दृश्यते ॥ ८ ॥ स्थिते जीवितबोधेऽस्मिञ्छून्ये नानामयात्मनि । परलोकात्मकः स्वप्नः कश्चनापि न दृश्यते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जीवभाव को मिटाकर जगत्‌भाव को भी मिटाने के लिए उपक्रम करते है। यह दृश्य न पहले था, न उत्पन्न हुआ, न वर्तमान काल में है और न आगे भविष्य में होगा । इस प्रकार जगत्‌ का मार्जन होनेपर यह जगत्‌ सद्रूप ब्रह्म ही होकर स्थित हे । इस प्रकार मार्जन द्वारा पहले जगद्रूप से ज्ञात चिदाकाशकी झलक स्वरूपभूत शुद्धब्रह्मभाव में ही स्थित होती हे । उस अवस्था में जीवन्मुक्त पुरुषों द्वारा चिदाकाश की झलक ही जगत्‌ है यह बात उसके ज्ञानसे ही जानी जाती है । जगत्‌ जड़रूप कुछ नहीं हे । जैसे स्वप्नो मेँ ओर मनोरथ द्वारा कल्पित नगरों में केवल एक निर्मल चिन्मात्र के सिवा अन्य कुछ नहीं है वैसे ही इस समय जाग्रत्‌ नामक जगत्‌ में चिन्मात्र के सिवा कुछ भी उपाधिस्वरूप नहीं हे । इस प्रकार उपाधि का मार्जन करने से अरूप हुए जीवों में अन्य रूप नहीं है, यों चिदेकरूपता सिद्ध हुई