Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 165, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कृतिमात्रात्म यथा स्वप्ने जगत्त्रयम् ।
हृदि सर्गात्प्रभृत्येव तथैवाभाति जाग्रति ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" (हे सौम्य, सृष्टि के पूर्व
यह एक अद्वितीय सत् ही था) इस श्रुति के अनुसार जिसमें सृष्टि के पूर्व में परिणामी या उपादान
कारण है ओर न सहकारी ओर निमित्त कारण ही है उससे जगत् उत्पन्न होता है, यह उक्ति कैसी ?
अतः यह कुछ भी उत्पन्न नहीं होता, जो उत्पन्न हुआ-सा मालूम पडता है वह अनादि ब्रह्म ही है
चित्स्वभाव होने से वह स्वयं ही जगत्-सा मालूम पडता है, यह सिद्ध हुआ