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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verses 11–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 165, verses 11–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

सन्त्येवासत्यभूतानि स्फारापि परमार्थतः । नास्त्येवाकारवत्तेयं स्वप्नोर्व्यामिव जाग्रति ॥ ११ ॥ नानात्मभासुरमपि स्वप्ने शून्यं यथा जगत् । तथैव जाग्रत्यखिलं व्योमैवेदं चिदात्मकम् ॥ १२ ॥ चिद्व्योम्नो हि स्वभावोऽयं यदिदं जगदम्बरे । कचतीत्थमिह स्फारमालोक इव तेजसः ॥ १३ ॥ चितेश्चमत्कृतिरियं जगन्नाम्नी चकास्त्यलम् । सहजा गगने कुड्ये परमाणौ स्थले जले ॥ १४ ॥ भ्रान्तावसत्यरूपायां स्थितायां सत्यवस्तुवत् । आकाशमात्रदेहायां क इवैनां प्रति ग्रहः ॥ १५ ॥ ग्रहीतृग्रहणग्राह्यरूपमाशून्यमेव च । सदस्त्वेवासदेवास्तु जगदत्राङ्ग किं ग्रहः ॥ १६ ॥ इत्थमस्त्विदमथान्यथास्तु वा मैव भूद्भवतु कोऽत्र संभ्रमः । कोऽत्र फल्गुनि फले फलग्रहो बुद्धमेव तदलं विकल्पनैः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी अर्थ को दृढ़ करते हुए पुनः स्पष्ट कहते हैं। इसलिए सृष्टि के आरम्भ में कोई भी अपने-आप उत्पन्न नहीं होता, अतएव अज्ञानियों द्वारा ज्ञात ब्रह्मा आदि व्यष्टि ओर समष्टि स्वयम्भू (ब्रह्मा) और यह प्रपंच ब्रह्म से शून्यरूपमें ही फैला है । चिदाकाश ही स्वचित्‌ से वैसा (जगत्‌-सा) प्रतीत होता है, यह सिद्ध हुआ, यह अर्थ है