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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सार्थकेनात्मशब्देन ख्यातिशब्देन चोज्झिताम् । आत्मख्यातिमिमां विद्धि शिलाजठरनिर्घनाम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जाग्रत्‌, स्वप्न और सुषुप्ति ये आपस में एक दूसरे में प्रवेश करने से तीन प्रकार के हैं । जैसे जाग्रत-जाग्रत, जाग्रत स्वप्न, जाग्रत सुषुप्ति, स्वप्नजाग्रत्‌, स्वप्न-स्वप्न, स्वप्न-सुषुप्ति, सुषुप्ति-जाग्रत्‌, सुषुप्ति-स्वप्न और सुषुप्ति-सुषुप्ति। उत्पत्तिप्रकरण में इनका उदाहरणों द्वारा विस्तार से प्रतिपादन किया जा चुका है, विशेष वहीं देखना चाहिये। उन भेदों में से जाग्रत्स्वप्न में मनोरथ में पदार्थों के इन्द्रिय व्यापार निरपेक्ष होने से केवल मनोमय होने के कारण स्वप्नसाम्य से स्वप्न ही जाग्रद्भाव को प्राप्त होता है। इसी प्रकार स्वप्न में भी इतने समय तक मैं सोया रहा इस समय जाग रहा हूँ ऐसी प्रतीति के दर्शन से प्रसिद्ध स्वप्नजाग्रत्‌ में तो अनुभवसिद्ध जाग्रत्‌ ही स्वप्नभाव को प्राप्त होता है, यह अर्थ है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ चौसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पैंसठवाँ सर्ग॑ परस्पर में प्रवेश और परस्पर से उत्पन्न होने से जगत्‌ की चिन्मात्रता सुदृढ़ करने के लिए जाग्रत्‌ ओर स्वप्न की एकता का कथन |