Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आत्मख्यातिपदस्यार्थ आत्मख्यातिपदोज्झितः ।
अनाद्यन्तो निरुल्लेखः सोऽयमेकघनः स्थितः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में तीनों
जगत् केवल चितूचमत्काररूप ही हैं वैसे ही सृष्टि से लेकर ही त्रिजगत् का अन्तःकरण में केवल चित्-
चमत्काररूप से स्फुरण होता है