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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

आत्मख्यातिरसत्ख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा । इत्येताश्चिच्चमत्कृत्या आत्मख्यातेर्विभूतयः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी परिस्थिति में आज के इस स्वप्न में, जो जीवन आदि सकल स्वाप्नपदार्थों से शून्य होनेपर भी भ्रान्ति से ही नानामयात्मक मालूम होता है, “मे जीता हूँ” यों जीवन आदि का बोध होनेपर आगे आनेवाले दिनका (कलका) तथा बीते हुए दिनका (कलका) स्वप्न परलोकसदृश ही है, इसलिए उसमें का कोई पदार्थ यहाँ (इस स्वप्न में) अनुवर्तमान नहीं दिखाई देता यह अर्थ है