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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

नसंधिबन्धा निबिडा वज्रसारा विसारिणी । अत्यन्तपुष्टकठिनजठराकाशनिर्मला ॥ १३ ॥ असंख्यकल्पनिचयमविनाशा घनाङ्गिका । कान्ताङ्गी निर्मलत्वेन व्योमरूपैव लक्ष्यते ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

चिदाकाश में जो यह जगत्‌ स्फुरित होता है यह सूर्य आदि के तेज की प्रभा के समान चिदाकाश का स्वभाव है । चिदाकाश में इस प्रकार विराट्रूप से उसी का स्फुरण होता हे । चिति की यह जगत्‌ नामक स्वाभाविकी चमत्कृति है । यह आकाश में, दीवार में, परमाणुओं में, जल में और स्थल में खूब चमकती हे