Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जातिस्तु ज्ञायते तस्या विशिष्टा नैव केनचित् ।
कथं कुत्र कदा चेति न विज्ञाता सदैव सा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह मिथ्या (असत्यस्वरूप) भ्रान्ति, जिसका
शरीर केवल भ्रान्तिमात्र है, सत्य वस्तु की नाई सामने खडी हे । इस जगद्भ्रान्ति के प्रति कौनसा आग्रह
है, इसके प्रति आग्रह करना अनुचित है, यह अर्थ है