Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अन्तस्तस्यास्तु हृदये भूतधातुविवर्जिते ।
निबिडानन्तकठिना वज्रसाराऽविनाशिनी ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
ग्रहीता (ग्रहण करनेवाला), ग्रहण और
ग्राह्यरूप जगत् असत् ही हे । उक्त जगत् अधिष्ठान सत्ता से सत् हो अथवा असत् ही हो इस विषय में
एकतर पक्ष के व्यवस्थापन में दुराग्रह का क्या प्रयोजन है ? यह भाव है