Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
निर्निमित्तं स्वरूपात्म तदेतत्परमात्मनि ।
सर्वात्मन्यपि निर्वाणे व्योमात्मनि निरात्मनि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
असंख्य कल्पो तक उसका नाश होनेवाला नहीं है, वह अत्यन्त निबिड अंगवाली
है, सुन्दरता में भी वह अपना जोड नहीं रखती और निर्मलता में तो वह आकाशसी दिखाई देती है