Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
तदेतदविनाशात्म सर्वत्र परमात्मनि ।
सर्वदा विद्यते शान्ते पयसीव तरङ्गकाः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उस शिला में कहींपर भी सन्धियों का जोड नहीं हे, वह अत्यन्त निबिड (ठोस),
वज्र के समान मजबूत, महान् विस्तारवाली, अत्यन्त पुष्ट ओर कठोर उदरवाली तथा आकाश के
समान निर्मल है