Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यत्तच्चित्काचकच्येन काकतालीयवद्वपुः ।
व्योमात्माऽऽभाति भावानां सत्तामात्रमभित्तिमत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर नीला आकाश ही यदि
दीवार या चट्टान बने उसके समान कठिन निर्मल और विशाल एक शिला है, जिसका विस्तार हजारों
करोड योजन हे