Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कदाचनापि नामाङ्ग संभवन्ति न काश्चन ।
शान्तमव्यपदेश्यात्मा ज्ञ आस्तेऽस्तङ्गतेङ्गनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा ही, ख्याति यों दो पदो का समानाधिकरणता से अन्वय करनेपर आत्मा कौन है वह ख्याति
किविषयिणी है किसको विषय करती है- ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते है ।
आदि सृष्टि से ही चिदाकाश ही इस प्रकार से (जगत् के रूपसे) फेला है । उसकी सर्गता आत्मा में
स्फुरित होती है । चूँकि आत्मा ने आत्मा में ही अपने चैतन्यबल से सर्गता का प्रख्यापन किया हे,
इसलिए यह आत्मा ही सर्गता को विषय करनेवाली ख्याति हे