Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
एता उद्यन्ति चिन्मात्रादात्मख्यात्यादिका दृशः ।
तच्च शुद्धतरं व्योम तन्मय्येव च दृश्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मशब्द के व्याख्यानभूत चिद्व्योम शब्द में व्योग शब्द का अर्थ प्रपवशून्यता ही है, इसलिए
प्रपंच और उसकी ख्याति आत्मा ही है, ऐसा एव“ का अर्थ दिखलाते है ।
न यहाँ नदियाँ बहती हैं और न यह उन्मज्जन ओर मज्जन (उतराना ओर डूबना) हैं। निष्क्रिय
चिद्रूप आकाश का ही आकाश में इस प्रकार (जगत् के रूप में) स्फुरण होता है