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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अयमात्मा त्वियं ख्यातिरित्यन्तःकलनाभ्रमः । न संभवत्यतश्चैनं शब्दं त्यक्त्वा भवार्थभाक् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्वान लोग ख्याति शब्द और उसके अर्थ के बिना स्वप्रकाश आत्मा को शब्द से रहित समग्र रूप से प्रख्यापक होने से कचन (स्फुरण) वाचक ख्याति शब्द से रहित समग्र रूप से कल्पनाशून्य आत्मख्याति कहते हे