Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
गच्छंस्तिष्ठन्नददपि सर्वे शान्तमतो जगत् ।
आकाशमौनमेवाच्छमच्छिन्नं वाऽप्रवृत्तिमत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सृष्टि के चिन्मात्ररूप होनेपर विभिन्न वादियो को अभिमत अख्याति आदि शब्दों की
असंगति है, ऐसा कहते है ।
जब यह सारा जगत् आत्मा ही है और वह स्वप्रकाशस्वरूप ही है यानी उसमें कोई भी ख्याति नहीं
है तब वह कदापि भी कहींपर भी अपने से अतिरिक्त ख्याति से ख्यापित है यह कथन और अख्यात है
यह कथन उसमें संभव नहीं हो सकता । भावार्थ "क्तिन् प्रत्ययान्त अख्याति पद की भी उसमें योजना
नहीं की जा सकती हे