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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

नानामहाशब्दमपि शिलामौनमवस्थितम् । अनारतं गच्छदपि व्योमवच्छैलवत्स्थितम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

भावार्थक क्तिन्‌! प्रत्ययान्त अख्याति पद की योजना उसमें क्यो नहीं की जा सकती ? इस प्रश्न पर कहते हैं। ख्या' धातु का प्रथा अर्थात्‌ प्रसिद्धि अर्थ है 'क्तिन्‌ प्रत्यय का "भाव अर्थात्‌ सत्ता' अर्थ है । यों ख्याति शब्द का अर्थ हुआ ख्यानात्मक सत्ता (प्रसिद्धयात्मक सत्ता) । उस प्रकार का आत्मा ख्याति ही है । अख्याति' के “नञ्‌ के अर्थ के साथ उसका अन्वय नहीं हो सकता, इसलिए उसमें अन्यामिमत अख्याति” कथन अवास्तव है । शंका-तव हेनुमत्‌ ण्यन्त ख्या धातु से क्तिन्‌ प्रत्यय हो। वहाँ भी णि“ का लोप होनेपर ख्याति“ रूप सिद्ध हो जायेगा। जिसमें ख्याति यानी ख्यापन नहीं है वह अख्याति है इस व्युत्पत्ति से आपका अभिमत अर्थसिद्ध हो जायेगा । समाधान-जब सर्ग को जड मानते हैं तब वहाँपर अन्य द्वारा किया गया ख्यापन ओर अख्यापन उपयुक्त हो सकता है । जब स्वप्रकाश आत्मा ही सर्ग है, तब जैसे एक दीपक में दूसरे दीपक से प्र्यापन या अप्रख्यापन कोई मतलब नहीं रखता वैसे ही उसमें प्रख्यापन और अप्रख्यापन अकिंचित्कर हे । इसलिए वादी का अभिमत अर्थ किसी प्रकार संगत नहीं हो सकता । इससे असत्ख्याति ओर अन्यथाख्याति का भी, जिन्हें अन्य वादी मानते हैं, निराकरण हो गया; क्योकि अर्थ के समान असत्‌ ओर अन्यथा शब्दों के अर्थो का भी ख्याति पदार्थ के साथ अन्वय नहीं हो सकता, यह भाव है