Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्वदैव च वा तुर्यं तदन्तः सर्वदैव वा ।
तदिदं वा न यद्विद्मो वयमाशान्तरूपिणः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
“जातिस्तु ज्ञायते तस्या विशिष्टा नैव केनचित्“ इस उक्ति से ही इस प्रश्न का उत्तर हो चुका है, यों
श्रीवलिष्टजी रामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान करते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : प्रिय रामजी, विशाल तथा देदीप्यमान वह शिला न चेतन है ओर न जड़
है । उसकी जाति को कौन जान सकता है ? उसमें दूसरा है भी कोन जो उसकी जाति को जानेगा ?
यह भाव हे