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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

इदं फेनो न किंचिद्वा बुद्बुदो वा न कश्चन । शून्यताम्भसि चिद्व्योम महार्णवमहोदरे ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, यदि उसमें कोई दूसरा नहीं है तो आपने जिन आकाश, वायु आदि के आकारवाली उसके उदर में स्थित रेखाओं का वर्णन किया है उन्हें कैसे देखता है अथवा किसने कब उसके अन्दर विचित्र रेखाओं के आकार में हथौडी आदि से उन्हें गढा ? ओर अन्दर हथोडी आदि का प्रवेश न हो सकने के कारण कैसे किसने उन्हें फिर विनष्ट किया ? यह मुझे बतलाने की कृपा कीजिये