Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verses 22–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verses 22–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 22-25
संस्कृत श्लोक
यथा संवेद्यते यद्यत्तथा तदनुभूयते ।
सद्वासद्वा भवत्स्वप्ने व्योम्नीव सदसच्च तत् ॥ २२ ॥
संवित्कचनमेवेदं यथा भानं विभासते ।
व्योम व्योमनि चिद्रूपं चिद्रूपे विततात्मनि ॥ २३ ॥
संविच्च चिन्नभोमज्जा सैवंरूपैव सर्वदा ।
नास्तमेति न चोदेति तस्याः स्वाङ्गमिदं जगत् ॥ २४ ॥
महाप्रलयसर्गाद्या महाप्रलयरात्रयः ।
तस्या एवावयवतां याताः केशनखादिवत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, वह अत्यन्त दृढ शिला तोडी नहीं जा सकती ओर न
कोई तोडनेवाला ही है । अपारपर्यन्त यानी अतिविशाल कायावाली उसीने सब कुछ व्याप्तकर रक्खा
है । उसके अन्दर रेखारूप असंख्य वृक्षराशिर्यो, पर्वतश्रेणिर्यो, नगर और ग्राम हैं | उसमें रेखारूप
ही सूक्ष्म, स्थूल, निराकार और साकार, देव, दानव आदि नामधारी जीव प्रतिमाओं की तरह
विद्यमान हैं उसमें आकाश नामकी विशाल रेखा है तथा उसके भीतर चन्द्र॒ ओर सूर्य नामकी
अन्यान्य उपरेखाएँ भी है