Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अन्तःसंवेदनं भाति स्वं बाह्यार्थतया यतः ।
क्व द्वैतं क्व च वार्थश्रीः स्मृतिरेवमतः कुतः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, उस तरह की वज से भी मजबूत वह शिला तोडी नहीं जा
सकती, फिर भी आपने उसके गर्भ में स्थित रेखाएँ कैसे देखीं ?