Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तस्मात्किं नाम जाग्रत्स्यात्कः स्वप्नः का सुषुप्तता ।
किं तुर्यं का स्मृतिः केच्छा तुच्छा एताः कुदृष्टयः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके अन्दर उस तरह की वे रेखाएँ मेने देखी हैँ । यदि
आपको उन्हे देखने की इच्छा हो तो आप भी उन रेखाओं को समाधि द्वारा देख सकते हैं