Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
संविद्धननभोमज्जा यथोदेति यदा यदा ।
नित्योदितोपचारेण कल्पितास्तमयोदया ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त को ही स्पष्टरूप से कहते हैं।
भूमि, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार ये सब उस शिला के अंग कहे गये
हैं