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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

आकाश एव पृथ्वीयमिति धत्ते स्वसंविदम् । मनोराज्यपुरं बाल इव चिन्मात्रमव्ययम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे पृथिवी, घडा, गङ्ख, वस्त्र आदि ही उससे पृथक्रूप से प्रसिद्ध हैं, तो इसपर “नही कहते हैं। ये भूतल, घट, पट आदि शुद्ध संवेदनरूप ही हैं जैसे स्वप्न में केवल संवेदनरूप घट, पट आदि का भान होता है और जैसे जलका ही तरंग, आवर्त, बुद्बुद्‌ आदि रूप से भान होता है वैसे ही इनका भी भान होता है