Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
स्वमेव भानमाकाशमात्रमेव महाचितिः ।
पृथ्व्यादिव्यपदेशेन पश्चाद्व्यपदिशत्यजा ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो यह चिन्मात्रैकस्वरूप अतिमहती शिला है यदि उससे पृथक् कोई है तो वह कहाँ पर है ओर वह
कौन है यह बतलाइये