Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 19–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verses 19–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
सर्गादावेव यद्व्योम्नि स्वप्नाद्धृदि च दृश्यते ।
अकारणं तच्चिद्व्योम्नः कथमन्यद्भवेत्किल ॥ १९ ॥
स्वप्न एवात्र दृष्टान्तो नित्यदृष्टो विचार्यताम् ।
चिन्मात्रव्यतिरेकेण सारं किं तत्र कथ्यताम् ॥ २० ॥
तदिदं बुद्धिसंस्कारदृश्यमित्यादिका स्मृतिः ।
न संभवति यत्तत्त्वं कथयेदं कथं भवेत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा चित् में कदापि स्वप्न न
होने से यह सब कुछ सदा ही जाग्रदरूप है या केवल भ्रान्तिमात्र होने से सदा ही स्वप्न है अथवा
अविद्याआवरणमात्र होने से सुषुप्त है अथवा स्वयं ही सदा तीनों अवस्थाओं का अतिक्रमण करने से
सदा ही यह सब तुर्य ही है, ऐसा कहा जा सकता हे । तीन अवस्थाओं की असिद्धि होने से तुर्य का अन्त
(अस्व) या निर्विकल्प में वह है या यह इत्यादि विकल्प को भी आशान्तरूपी हम नहीं जानते हे । जैसे
शून्यतारूपी जल में यह फेने है या कुछ नहीं हे, यह बुद्बुद् है अथवा कुछ नहीं हे यह विकल्प व्यर्थ है
वैसे ही चिदाकाशरूपी महासागर के महागर्भ में यह जाग्रत है या यह स्वप्न है अथवा यह सुषुप्ति है यह
विकल्प व्यर्थ है