Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 22–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verses 22–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 22-34
संस्कृत श्लोक
यत्तत्र दृष्टं तदिह स्मृतिकाले भवेद्यदि ।
नानुभूयेत तत्तत्र कैवैकस्य द्विधा स्थितिः ॥ २२ ॥
तस्मादावर्तवृत्त्येदं काकतालीयवज्जगत् ।
चिति यद्भाति तत्रैषा पश्चात्स्वप्नादिकल्पना ॥ २३ ॥
अबुद्धिपूर्वं संपन्ने सर्गे वीच्यादयो यथा ।
संनिवेशः स्थितिः पश्चात्स्वयं संपद्यते तथा ॥ २४ ॥
जातमेव न तज्जातं जातं यत्कारणं विना ।
यतोऽजातं तदेवाद्य तत्समं संस्थितं तथा ॥ २५ ॥
अबुद्धिपूर्वं संजाता रत्नादीनां यथार्चिषः ।
सत्तैव संनिवेशेन तथैवासां जगद्दृशाम् ॥ २६ ॥
यथाकथंचिदेवेदमादौ संपद्यते जगत् ।
पश्चाद्गृह्णाति नियतिमावर्तोऽब्धाविवात्मनि ॥ २७ ॥
चिद्व्योम्नि स्वप्नजालानि चिज्जगन्त्यपकारणम् ।
प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते शून्यशून्यात्मकान्यपि ॥ २८ ॥
यावत्सर्वमथान्योन्यं याति कारणतां चिरम् ।
तेषां शून्यात्मका एव पदार्था ईश्वरादयः ॥ २९ ॥
जायते शून्यमेवेदं शून्यमेव च वर्धते ।
ननु शून्यतयात्यन्तं शून्यमेव विनश्यति ॥ ३० ॥
शून्यं कचत्यशून्याभं दृष्टान्तं स्वप्नमत्र यः ।
अपह्णुतेऽनुभूतं स पशुभर्तृकुकं कुधीः ॥ ३१ ॥
असदेवेदमाभाति भ्रान्तिमात्रं सुकृत्रिमम् ।
चिच्चमत्कारमात्रात्म ज्ञे सन्मात्रकृत्रिमम् ॥ ३२ ॥
अयं चिरस्थसंकल्पः सर्गप्रलयविभ्रमः ।
ज्ञानं स्वभावकचनमज्ञानं भ्रान्तिजृम्भणम् ॥ ३३ ॥
झटित्युदेति ब्रह्मात्म दृश्यं दृष्टमकारणम् ।
खे सुषुप्तादिव स्वप्नः पश्चान्नियतिमृच्छति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्पनावेदनदरष्टि से जिसने जब जैसा जाना उसको तब यह ऐसा ही है, यो सन्तोष करना चाहिये,
ऐसा कहते हैं।
जिस समय जिसका जिसको जैसे स्मरण होता है सत् हो चाहे असत् उसका उसको उस समय
वैसा अनुभव होता है आपके स्वप्न की तरह चिति चिदाकाश में ही सत्असत् पदार्थों का अनुभव
करती हैं । यह संवित् का स्फुरण रूप ही चिद्रूप आकाश सर्वव्यापक चिद्रूप आकाश में भान के
अनुसार भासता है । ओर चिदाकाश की मज्जारूप (वसारूप) वह संवित् सर्वदा एेसी ही है । न कभी
अस्त को प्राप्त होती है ओर न कभी उदित होती है, यह जगत् उसका अंगरूप है । महाप्रलय, सृष्टि
आदि काल-विभाग ओर उसमें महाप्रलयरूपी रात्रियाँ और सृष्टिरूपी दिन केश, नख आदि के
समान उसीके अवयवभूत हुए हैं | उसका वह चिद्रूप भास्वर भान अथवा मायारूप अभान वायु के
स्पन्द के समान महाचैतन्य का स्वभाववत् है । अन्य (भिन्न) नहीं है । ऐसी परिस्थिति में क्या जाग्रत्
होगा, क्या स्वप्न होगा, क्या सुषुप्ति होगी, क्या तुरीयअवस्था होगी, क्या स्मृति होगी ओर क्या
इच्छा होगी ? ये सबकी सब जाग्रदादिदृष्टियाँ कुदृष्टियाँ है । चूकि अपना आभ्यन्तर संवेदन ही बाह्य
पदार्थ के रूप से प्रतीत होता हे अतः कहाँ द्वैत है ओर कहाँ पदार्थशोभा है ? ऐसी स्थिति में स्मृति
भी कहाँ से होगी ? भेदशून्य जो यह अपने से भासित होता है वह स्वभान (स्वरूपभूत ही भान)
है, स्वभिन्न नहीं हे । जैसे सूर्य का निराश्रय आकाश में भूतरहित प्रभारूप ही भान है वह किसी भास्य
की अपेक्षा नहीं करता वैसे ही यह भूतविवर्जित चिद्भान ही है उससे अतिरिक्त नहीं है । यदि बाह्य
पदार्थ सद्रूप होता तो उसके अनुभव से उत्पन्न स्मृति सर्ग के आदि काल की जगतस्थिति की कारण
हो सकती, किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ में उपपादन, निमित्त, सहकारी आदि कारणों का अभाव होने से
पंचमहाभूतों का अत्यन्त असंभव हे, अतः यह बाह्य अर्थ है ही नहीं । यह बाह्य अर्थ का वैसे ही
अस्तित्व नहीं है जैसे कि खरगोश के सींगों का अस्तित्व नहीं है और जैसे आकाश वृक्ष का अस्तित्व
नहीं हे । जैसे वन्ध्या का पुत्र नहीं है ओर जैसे काला चन्द्रमा नहीं है ठीक वैसे ही सृष्टि के आदि
में अज्ञानियों को प्रतीत हो रहा जगत् आदि, "अहम्" आदि पदार्थ तत्त्वदृष्टि से देखा जाय तो है
यदि तत्त्वतः देखा जाय तो कुछ भी नहीं हे । जैसे अज्ञानियों के प्रति महाकाय है वैसे ही तत्त्वज्ञानियों
के प्रति मूर्तअमूर्तरूप से रहित चिन्मात्रएकघन अखंडित ही हे