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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 35–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verses 35–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 35-39

संस्कृत श्लोक

काकतालीयवच्चित्त्वाच्चिति दृश्यं प्रकाशते । स्वयमेव स्वभावस्थमावर्तादि यथाम्बुधौ ॥ ३५ ॥ ईदृशो नाम चिद्धातुरयमाकाशमात्रकः । यदित्थं नाम कचति जगद्रूपेण चिद्वपुः ॥ ३६ ॥ तेन चिद्रूपिणा पश्चाद्दृश्येनात्मनि कल्पिताः । संज्ञाः स्मृत्यादिपृथ्व्यादिबुद्ध्यादिकलनात्मिकाः ॥ ३७ ॥ श्रीराम उवाच । एवं स्थिते हे भगवन्बुद्धिसंस्कारतः स्मृतिः । इति किं प्राप्यते ब्रूहि संबुद्धा यदि न स्मृतिः ॥ ३८ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । श्रृणु राम भिनद्म्येनं प्रश्नं सिंह इवेभकम् । अभेदं स्थापयाम्येकमालोकमिव भास्करः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

संवित्‌घन चिदाकाश की मज्जाभूत संवित्‌ यद्यपि नित्य ही उदित है तथापि जब-जब जैसे उदित होती हे तब तब व्यवहार में उपचार से (गौणीवृत्ति से) उसमें अस्त ओर उदय की कल्पना की जाती हे । अज्ञानी जब जब अज्ञान से व्यर्थ ही आकाश में पृथिवी आदि रूप से उसे जानता है तब तब वह उस अपने भान में ही पृथिवी की कल्पना करता है । अजन्मा (जन्म आदि विकाररहित) आकाशरूप महाचिति स्वभान का ही पीछे पृथिवी आदि नाम से व्यवहार करती हे जैसे मूर्ख मनोरथनगर में यह नगर है ऐसी संवित्‌ करता है वैसे ही अविनाशी चिन्मात्र आकाश में ही "यह पृथिवी है” ऐसी संवित्‌ धारण करता है । यदि वह चिन्मात्र ही है तो उसका जगदाकार में भान क्यों होता है ओर अभान भी क्यों होता है ऐसा विकल्प नहीं करना चाहिये, क्योकि आकाश में वायु के समान उसे आप स्पन्द ओर अस्पन्द स्वभाववाला जानिये । प्राणशक्ति से वह स्पन्दस्वभाववाला है और चित्‌-शक्ति से अस्पन्दस्वभाववाला है, ऐसा जानिये, यह भाव है