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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

विद्यते जगदात्मेदं दृश्यं चिन्मात्रकोटरे । अनुत्कीर्णा यथा वृक्षे वनस्था शालभञ्जिका ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

चिदाकाश जैसे जैसे वासना के उद्भव से स्फुरित होता हे वैसे वैसे यह जगत्रूप से भासित होता है । आकाश में निराकार आकाश ही है, यह पृथिवी आदि कहींपर भी सत्‌ नहीं है