Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 43–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 43,44
संस्कृत श्लोक
भासमाना त्वनुत्कीर्णदेहैवापि च खात्मिका ।
स्वरूपादच्युता चैव चिन्मात्रादात्मनि स्थिता ॥ ४३ ॥
सर्गादौ सर्गकलनाः करोति कलनावती ।
सा चित्स्वभावतः स्वप्ने खात्मन्यद्योदितामिव ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
यथास्थित यह जगत् ऐसा हे ओर ऐसा नहीं है, सत् है अथवा असत् हे इस
लोकपर्यायवृत्तान्त को तत्त्वज्ञ ही जानता है, अन्य (अज्ञानी) नहीं जानता॥४ २॥ चूँकि वह प्राज्ञ (तत्त्वज्ञ)
ही सबके हृदयाकाश में आत्मरूप से रहता है, अतः आत्मरूपसे ही स्फुरित हो रही दृश्य संवित् से यह
आभ्यन्तर (शरीर) है, यह बाह्य ब्रह्माण्ड हे इत्यादि भेदकल्पनाओं द्वारा नाम किया गया हे । इस प्रकार
क्या यहाँपर बाह्य है अथवा क्या आभ्यन्तर है, क्या दृश्य है और क्या इसकी दृश्यता है ? शिव, शान्त
ओर अशान्त सब कुछ ॐकारूप प्रणवमात्र है यों अभेदकल्पना द्वारा प्रविलापन कर शान्त
होइये