Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
आकाश एव हृदये परमाकाशरूपिणी ।
संकल्पयति चिच्छालभञ्जिकाः स्वात्मनात्मनि ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक विचार करना हो तव तक लोकनीति के अनुसार वाच्यवाचकभाव, वाहे वह असत् ही
क्यो न हो, स्वीकार करके ही श्रवण, मनन आदि विधियाँ प्रवृत्त होती है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी
कहते हैं।
वाच्यवाचकभाव के बिना शास्त्रार्थविचार नहीं हो सकता । और वह शास्त्रार्थविचार “विषयो
विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् । प्रयोजनं च पंचांगं शास्त्रेऽधिकरणं विदुः ।” शास्त्र में विषय, सन्देह,
पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष (सिद्धांत) और प्रयोजन इन पाँच अवयवोंवाला अधिकरण कहा गया है। यों प्रसिद्ध
पंचावयव विकल्प से किया जाय तो सिद्धि के लिये होता है। जैसे रात्रि में दीपक के बिना चाक्षुष प्रत्यक्ष
नहीं होता वैसे ही उक्त विचार के बिना कुछ भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती