Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रात्संप्रवर्तन्ते मनोबुद्ध्यादयस्तथा ।
आवर्तकणकल्लोलवीचयो वारिधेर्यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस परमार्थदर्शन से चल
रहा, ठहर रहा और खा रहा सारा जगत् शान्त, आकाश के समान मौन, निर्मल, निरवच्छिन्न तथा
अप्रवृत्तिमान् ही प्रतीत होता है