Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
भित्तिमात्रं यथा चित्रजगदालोकमात्रकम् ।
चिति चिद्व्योममात्रात्म तथैवाभासमात्रकम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का विशदरूपसे प्रतिपादन करते हैं।
उक्त परमार्थदर्शन से नाना महाशब्दो से भरा हुआ भी यह जगत् शिलावत् मौन स्थित हे । निरन्तर
चलता हुआ भी आकाश के समान तथा पर्वत के समान अचल (स्थिर) ह