Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अबुद्धिपूर्वमारम्भो नियत्या संनिवेशवान् ।
यथा संपद्यते वृत्ते तथा सर्गात्मकश्चिति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
भाँति-भाँति के अनेक
आरम्भो से (कर्मो से) पूर्ण भी यह महाशून्य तथा अनाकृत है । पंचभूतात्मक होनेपर भी अलब्ध
पंचभूतवाले आकाश के समान स्थित है