Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 8–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verses 8–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 8- 10
संस्कृत श्लोक
तरौ गुलुच्छकादीनां यथान्यः कुरुतेऽभिधाः ।
तथा चिद्वृक्षपुष्पादिपृथ्व्यादिविहिताभिधम् ॥ ८ ॥
अनन्यत्पुष्पपत्रादि यथा नाम महातरोः ।
तथैवानन्यदेवेदं चिद्व्योम्नः परमात्मनः ॥ ९ ॥
तराववयवेप्वन्यः करोति विविधाभिधाः ।
चिद्व्योमात्मनि सर्वेषु भूत्वान्य इव खात्मसु ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
विविध पदार्थों से परिपूर्ण भी यह शून्य संवेदनमात्र है ।
स्वप्न में देखे गये महासागर के समान दिखाई देनेपर भी निर्मल चिन्मय है । संकल्पनगर के समान
आरम्भयुक्त होनेपर भी आरम्भशून्य है ओर स्वप्न-स्त्रीसंगम के तुल्य भ्रान्तिरूप अतिशून्य है । दर्पण
में प्रतिबिम्बित या चित्रलिखित अंगना के समान अनुभूत होनेपर भी व्यर्थ हे । उसमें नाना भुवनो का
निर्माण होनेपर भी वह वस्तुतः वस्तुशून्य है