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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

चित्तरोः पल्लवाः सर्गाश्चित्त्वादेव न सन्त्यलम् । कार्यकारणवद्भाति स एव स्वप्नवत्स्वयम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, यदि अविद्यमान ही जाग्रत्‌ ओर स्वप्नरूप जगत्‌ केवल वासना से दृष्टिगोचर होता है तो स्मृति से ही वह दृष्टिपदारूढ होता है, ऐसा मैं समझता हूँ, यानी मेरी समझ में जगत्‌ के भान में स्मृति ही कारण है भ्रान्ति कारण नहीं है क्योकि स्मृति अधिष्ठान, दोष, सादृश्य आदि निमित्तो की अपेक्षा नहीं करती केवल अविद्यमान पदार्थगोचर है