Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
ते हि चेत्यचिदाभासनभस्याभान्ति भामयाः ।
भास्करा उदिता नित्यं नेह तिष्ठन्ति ते क्वचित् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सृष्टि आदि है
ही नहीं तो चित्को परलोक में व्यर्थ ही उसका अनुभव होता है यह मानना पड़ेगा यह ठीक नहीं हे,
क्योकि सर्ग का अभाव माननेपर वह विहित-निषिद्ध कर्मो का फल रहा नहीं, फिर परलोक मेँ सर्ग
आदि का अनुभव कैसे होता है ? ऐसा यदि आप आक्षेप करें तो स्वप्न आदि में तथा इन प्रसिद्ध
रज्जुसर्प, मरुमरीचिका आदि अनुभवों में कोन व्यर्थता का निवारण कर सकता है, क्योकि उनमें भी
तो स्वाप्न आदि भोग देनेवाले कर्म की सफलता है तो वह प्रकृत में कहो कि वहाँपर भोगाभासमात्र
देखने से कर्म की सफलता है तो वह प्रकृत में भी समान हे यानी प्रकृत में भी भोगाभासमात्र से वह
सफलता क्यो न होगी ? यह भाव है