Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अपसर्पं निरस्तेहमस्वप्नमसुषुप्तकम् ।
प्रबुद्धमबहिर्निद्रं हा शेते सुखमात्मवान् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कारण के बिना उत्पन्न होता है वह उत्पन्न
हुआ भी अनुत्पन्न ही है इसलिए अजात (अनुत्पन्न) वही आद्य जात-सा (उत्पनन-सा) स्थित हे