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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 27–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verses 27–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

अपूर्वैव घना निद्रा कापि सा तत्त्वदर्शिनाम् । या न शाम्यति कल्पाभ्ररवैर्नाङ्गविकर्तनैः ॥ २७ ॥ अपूर्वैव घना निद्रा कापि सा तत्त्वदर्शिनाम् । प्रबुद्धानामपि हि या निमीलयति दृग्दृशौ ॥ २८ ॥ अनिमीलितनेत्रस्य यस्य विश्वं प्रलीयते । स क्षीवः परमार्थेन हा शेते सुखमात्मवान् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यथाकथंचित्‌ यानी अनिर्वचनीय मायारूप कारण के बल से ही सृष्टि के आरंभ सागर में आवर्तं की भाँति यह जगत्‌ उत्पन्न होता है पीछे अपने में अर्थक्रियाकारितारूप सत्यता का ग्रहण करता है । चिदाकाश में विविध स्वप्न परम्पराओं की तरह चिदाकाश मेँ चिद्रूप जगत्‌ अत्यन्त शून्य से शून्य होनेपर भी धाराप्रवाहरूप से उत्पन्न होते हैं ओर विनष्ट होते हैं यानी आविर्भूत होते हैं ओर तिरोभूत होते है । तदुपरान्त सकल पदार्थ चिरकाल तक परस्पर कार्यकारणभाव को प्राप्त होते हैँ । उनके ईश्वर (&) आदि पदार्थ शून्यात्मक ही हैँ