Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
विनिगीर्य जगत्सर्वं परमां पूर्णतां गतः ।
आतृप्तेरमृतं पीत्वा हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यह दृश्य शून्य ही उत्पन्न होता है,
शून्य ही यह बढ़ता है ओर शून्यता से अत्यन्त अविद्यमान ही विनष्ट होता हे